मित्तल साहब, ज़रा इस तरफ़ आइए… यहाँ से पूरा बाग़ दिखाई देता है। बड़ा सुकून है इस जगह में। शहर के शोर-शराबे से दूर आदमी दो घड़ी चैन से सोच तो सकता है।
देखिए मित्तल साहब, कारोबार में मैंने एक बात सीखी है पैसा कमाना मुश्किल नहीं है, मुश्किल है उसे सही वक़्त पर सही जगह लगाना। आदमी अगर हर चमकती चीज़ को सोना समझ बैठे, तो फिर घाटा होने में देर नहीं लगती।
और हमारा जो नया कारख़ाना लगाने का विचार है न, उसमें मैं जल्दबाज़ी के हक़ में बिल्कुल नहीं हूँ। ज़मीन अच्छी है, बाज़ार भी है, लेकिन मित्तल साहब… सिर्फ़ बाज़ार देखकर कारोबार नहीं चलता। आदमी को यह भी देखना पड़ता है कि कल की हवा किस तरफ़ बहने वाली है।
अब आप कहेंगे कि मैं हमेशा इतना हिसाब-किताब क्यों करता रहता हूँ। तो जनाब, हमने ज़िंदगी में बहुत कुछ आँखों के सामने बदलते देखा है। जो आदमी कल तक बाज़ार का बादशाह था, आज उसके दफ़्तर पर ताला लगा है। और जो कल तक हमारे साथ छोटी-सी दुकान में बैठकर चाय पीता था, आज उसके माल की गाड़ियाँ पूरे मुल्क में जाती हैं।
इसलिए मेरा कहना सिर्फ़ इतना है, मित्तल साहब हम बड़ा काम करें, मगर ऐसा काम करें कि दस साल बाद भी लोग कहें, भई, इन लोगों ने उस वक़्त सही फ़ैसला किया था।
हाँ… मुनाफ़ा थोड़ा कम हो जाए तो कोई ग़म नहीं। कारोबार की असली इज़्ज़त मुनाफ़े की रकम से नहीं, भरोसे से बनती है।
और एक बात कहूँ, मित्तल साहब? साझेदारी में हिसाब किताब काग़ज़ पर जितना साफ़ हो, रिश्ते उतने ही आसान रहते हैं। आदमी को दोस्ती अपनी जगह रखनी चाहिए और कारोबार अपनी जगह।
चलिए, अब आगे चलते हैं। ये गुलाब देख रहे हैं? बड़े ख़ूबसूरत हैं… मगर काँटे भी कम नहीं हैं। कारोबार भी कुछ ऐसा ही है, मित्तल साहब ख़ूबसूरती दूर से दिखाई देती है, काँटों का पता पास आकर चलता है।